Showing posts with label गद्द. Show all posts
Showing posts with label गद्द. Show all posts

Monday, April 13, 2015

माँ तो सबकी एक-जैसी होती है



16.06.2011

बस से उतरकर जेब में हाथ डाला। मैं चौंक पड़ा। जेब कट चुकी थी। जेब में था भी क्या?   कुल 400 रुपए और एक खत, जो मैंने माँ को लिखा था कि—मेरी नौकरी छूट गई है; अभी पैसे नहीं भेज पाऊँगा…। तीन दिनों से वह पोस्टकार्ड जेब में पड़ा था। पोस्ट करने को मन ही नहीं कर रहा था। 400 रुपए जा चुके थे। यूँ 400 रुपए कोई बड़ी रकम नहीं थी, लेकिन जिसकी नौकरी छूट चुकी हो, उसके लिए 400 रुपए 4000 से कम नहीं होते। कुछ दिन गुजरे।   

माँ का खत मिला। पढ़ने से पूर्व मैं सहम गया। जरूर पैसे भेजने को लिखा होगा।…लेकिन, खत पढ़कर मैं हैरान रह गया। माँ ने लिखा था—“बेटा, तेरा 1000 रुपए का भेजा हुआ मनीआर्डर मिल गया है। तू कितना अच्छा है रे!…पैसे भेजने में कभी लापरवाही नहीं बरतता।” मैं इसी उधेड़-बुन में लग गया कि आखिर माँ को मनीआर्डर किसने भेजा होगा? कुछ दिन बाद, एक और पत्र मिला। चंद लाइनें थीं—आड़ी-तिरछी। बड़ी मुश्किल से खत पढ़ पाया। लिखा था—“भाई, 400 रुपए तुम्हारे और 600 रुपए अपनी ओर से मिलाकर मैंने तुम्हारी माँ को मनीआर्डर भेज दिया है। फिकर न करना।… माँ तो सबकी एक-जैसी होती है न। वह क्यों भूखी रहे?…

तुम्हारा— जेबकतरा भाई

Wednesday, June 11, 2014

प्रेम में स्मृति का ही सुख है

प्रेम में स्मृति का ही सुख है . एक तीस उठती है, वही तो प्रेम प्राण है. आश्चर्य तो यह है कि प्रत्येक कुमारी के ह्रदय में वह निवास करती है, पर उसे सब प्रत्यक्ष नहीं कर सकती, सबको उसका मार्मिक अनुभव नहीं होता. 

- नमालूम

06.09.99

घास पर अपने आंसुओं में छोड़ जाती हूँ.

सूर्य से रात्री कहती है- चन्द्रमा के द्वारा तुम मुझे प्रेम पत्र भेजा करते हो. मैं तुम्हारे उन पत्रों के उत्तर घास पर अपने आंसुओं में छोड़ जाती हूँ.

- नमालूम

पहला आंसू

पहला आंसू  शायद कठिनाई से बाहर निकलता है , किन्तु उसके बाद अन्तिम आंसू कठिनाई से रुकता भी है

- नमालूम

प्यार से ही त्याग की भावना आती है

प्यार किये बिना हम कुछ नहीं कर सकते . प्यार से ही त्याग की भावना आती है और त्याग ही मानव को सच्चे अर्थों में मानवीय बनाता है, स्वार्थ से उठाता है ..

- महात्मा गांधी

कोई दूर होते हुए भी पास लगता है

आग नजदीक होती है तभी आंच देती है. परन्तु इन दिलों की बात अलग है . कोई दूर होते हुए भी पास लगता है और कोई पास होते हुए भी दूर.

- नमालूम

हवा के झोंके बुझाना चाहते हों

उस अंधेरे में तारों की झीनी रौशनी में और दूर खम्बे पर बिजली के प्रकाश में उसके चेहरे पर मुस्कान  और आसुंओं का मिला जुला असर बड़ा ही सुन्दर लग रहा था. वैसे भी आंसुओं को रोकने और मुस्कराने की कोशिश में नारी के मुख पर एक तेज आ जाता है , जैसे एक दीपक हो जो जलना चाहता हो परन्तु जिसे हवा के झोंके बुझाना चाहते हों.

- नमालूम

जो कुछ विशेषकर उसके लिए होता है

मानव जिससे प्रेम करता है , उससे सब कुछ पाने की आशा करता है. वह जो सबके लिए नहीं होता है, जो कुछ विशेषकर उसके लिए होता है .

- नमालूम

बातें करते-करते कई बातें छिपा जाती जाती है

प्रत्येक नारी बातें करते-करते कई बातें छिपा जाती जाती है. वह जीवन में सभी कुछ सम्पूर्ण चाहती है , पर बातों को वह अपूर्ण ही छोड़ती है. मैंने उसके चेहरे की ओर देखा था. उस पर शांति थी, कोई चिंता, कोई उत्कंठा न थी. दूसरे के मन में तृष्णा जगाकर दूर पे जाने में नारी को आनंद मिलता है

- नमालूम

आज भी उन दिनों को याद कर

आज भी उन दिनों को याद कर  मन में एक कम्पन पैदा हो जाता है . एक पीड़ा समूचे असितत्व को घेर लेती है. नंदनी, कभी-कभी ऐसा क्यों होता है कि कोई व्यक्ति हमारे लिए समूचा संसार बन जाता है ? उस समय ऐसा लगता है , हमारी सारी प्रसन्नता , हमारा सब कुछ उस व्यक्ति पर निर्भर है हमारा जीवन , हमारी मुक्ति भी उस पर आधृत है .

- नमालूम

.......... ऐसा लग रहा था मानो

.......... ऐसा लग रहा था मानो मुझे सब कुछ मिल गया था और उसके बाद मुझे किसी अन्य वस्तु की जरूरत न थी. मेरे मन का प्याला छलकने लगा था, अब उसमें एक बूँद भी जगह नहीं थी. रात की खामोशी में मुझे सुकून मिल रहा था. मुझे यह सोचते हुए आश्चर्य लग रहा था कि ऋषि - मुनि हिमालय की कंदराओं में जाकर शान्ति की प्राप्ति की तपस्या क्यों करते हैं. इस दुनिया में ही किसी प्रियजन के पार्श्व में बैठकर भी सम्पूर्ण शान्ति प्राप्त की जा सकती है. ऐसे समय में पूर्णतः के क्षणों को बार-बार छुआ जा सकता है. सुदूर को अपने ही निकट पाया जा सकता है.

- नमालूम

वो और मैं कभी-कभी समुद्र तट पर

वो और मैं कभी-कभी समुद्र तट पर अकेले बहुत दूर निकल जाते थे. वहाँ जहाँ कोई नहीं होता था. केवल किनारा, लहरें होती थीं. और समुद्र की आवाज़ आसमान में फ़ैल जाती थी. हम डॉ बिन्दुओं की तरह उस अथाह कुदात में गम हो जाते थे. ऐसे में कभी-कभी सृष्टि में खो जाने पर कितना बड़ा आनंद मिलता है. वहां खड़े होकर बहुत दूर ढलते हुए सूर्य को देखते थे. वह दृश्य हमारे समूचे असितत्व को झकझोर कर  रख देता था. हम बिलकुल खामोश हो जाते थे.

- नमालूम

स्त्री कितनी ही बुद्धिमती हो

स्त्री कितनी ही बुद्धिमती हो, कितनी भी साहसी हो, परन्तु जीवन के ऐसे अवसरों पर, जब वह किसी पुरुष को चाहने लगती है. वह सब कुछ भुला बैठती है. वास्तव में ऐसे अवसरों पर वह अपनी स्वामिनी स्वयं नहीं होती है. वह बेबस कठपुतली की तरह चलती है और उसे चलाने वाला होता है वह पुरुष ,  जिसे वह उस समय भगवान से भी अधिक समझती है.

- नमालूम

दुनिया में आईना नहीं होता तो इंसान कभी बूढ़ा नहीं होता

मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है कि अगर दुनिया में आईना नहीं होता तो इंसान कभी बूढ़ा नहीं होता . इंसान का दिल तो कभी बूढ़ा नहीं होता. मेरा मन आज भी घायल है . आज मैं सारी रातें रोते गुजारता हूँ .

- नमालूम

Wednesday, May 28, 2014

विपत्ति को संपत्ति बनाईये

एक चित्रकार ने एक  चित्र बनाया जिसमें सर्प, मोर, हिरन, और शेर एक साथ एक वृक्ष की छाया में बैठे थे. चित्र के नीचे यह पंक्ति लिखी हुयी थी-
' कहलाने एकत बसत अहि -मयूर-मृग-बाघ'.

जयपुर के राजा मिर्जा जय सिंह ने उस चित्र को खरीद लिया. और अपने राज कवि बिहारी लाल से कहा कि उस दोहे की पूर्ती करें. बिहारी लाल ने तत्काल यह पंक्ति लिख कर दोहे को पूरा कर दिया-
' जगत तपोवन सो कियो दीरध दाघ निदाघ'

कवि का तात्पर्य स्पष्ट था कि कड़ी गर्मी ने जगत को तपोवन के समान पवित्र कर दिया है और ये पशु अपना सहज बैर भाव भूलकर एक वृक्ष की छाया में बैठ गए हैं.

विपत्ति के समय पशु पक्षी भी सहज बैर भाव भूल जाते हैं. ऐसी बात नहीं है, मनुष्य भी ऐसा करते हुए देखे जाते हैं. देश में विदेशी आक्रमण की दशा में विभिन्न राजनीतिक दल, सांप्रदायिक दल आदि अपना पारस्परिक मतभेद भुलाकर विदेशी आक्रान्ता के विरुद्ध एक जुट हो जाते हैं. आग लगने पर, भूचाल आदि दैवी आपदा आने पर सब लोग एक दुसरे की मदद करते हुए देखे जाते हैं. और तो और विरोधी अथवा जानी दुश्मन के पुत्र के निधन के शोक पर लोग आंसू बहते हुए देखे जाते हैं. इस सन्दर्भ में हम सन 1947 में भारत विभाजन के अवसर पर  तथाकथित शरणार्थियों के पलायन की घटना की चर्चा करना चाहेंगे. कई-कई हजार स्त्री पुरुष कई-कई दिनों तक एक साथ रहने को विवश हुए थे. परन्तु उस अवसर पर चोरी, अपहरण, बलात्कार आदि की एक भी घटना नहीं घटी आदि .

व्यक्तिगत जीवन में भी विपत्ति हमारे मनोभावों का परिष्कार करती हुयी देखि जाती है.  विपत्ति में हम बैर भाव भूलते ही हैं हम अपने दोषों को दूर करने का संकल्प करते हुए देखे जाते हैं. इतना ही नहीं विपत्ति अथवा दुःख के समय हम भगवान   का स्मरण जैसा पवित्र कार्य करने लगते हैं. वह एक विपत्ति का ही अवसर था जब महाराणा प्रताप को मरणासन्न अवस्था में देखकर उनके खून का प्यासा छोटा भाई समस्त शत्रु भाव को भूलकर उनके चरण में गिर पड़ा था. इस सन्दर्भ में महाभारत का यह कथन मनन करने योग्य है- विपत्ति के आने पर अपनी रक्षा के लिए व्यक्ति को अपने पड़ोसी शत्रु से भी मेल कर लेना चाहिए. विपत्ति के भावात्मक पक्ष को लक्ष्य करके लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने लिखा है कि -
' कष्ट और विपत्ति मनुष्य को शिक्षा देने वाले श्रेष्ठ गुण है, जो मनुष्य साहस के साथ उन्हें सहन करते हैं वे अपने जीवन में विजयी होते हैं'.

विपत्ति के हमारा मन प्रायः अंतर्मुखी हो जाता है, हम विपत्ति के कारणों पर तथा उसके निवारण के उपायों पर गंभीरता पूर्वक विचार करने लगते हैं. और प्रायः ऐसा होता है कि विपत्ति की अग्नि में तपकर हमारे कुछ सद्गुण उभरकर आ जाते हैं. डिजरैली ने बहुत ठीक कहा है कि विपत्ति सहना कोई शिक्षा नहीं है. यह सत्य तो सर्वविदित है कि विपत्ति के समय हमें शत्रु मित्र की पहचान भली प्रकार से हो जाती है. प्लूटार्क नामक विचारक का यह कथन मनन करने योग्य है -

' विपत्ति ही केवल ऐसी तुला है जिस पर हम मित्रों को तौल सकते हैं'
गोस्वामी तुलसीदास का यह कथन उल्लेखनीय है-
' धीरज, धर्म,मित्र ,अरु नारी
आपातकाल परखिये चारी '
अर्थात विपत्ति के समय ही अपने और पराये की पहचान हो जाती है.

विपत्ति वास्तव में एक बहुत बड़ी संपत्ति है. वह हमारे मनोविकारों का परिष्कार करके मन में सद्भाव, सहयोग, शुभ संकल्प आत्म विश्वास आदि श्रेष्ठ गुणों को विकसित करती है.

विपत्ति हमारे मन के मेल को काटती है और हमें भावात्मक दृष्टि प्रदान करती है.

उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का यह कथन हमारा मार्गदर्शक होना चाहिए-

' विपत्ति में भी जिस ह्रदय में सद्ज्ञान न हो, वह ऐसा सूखा हुआ वृक्ष है जो पानी पाकर पनपता नहीं , बल्कि सड़ जाता है'

27.04.99

Wednesday, May 21, 2014

ध्रुवस्वामिनी से ......

कितना अनुभूति पूर्ण था वह एक क्षण का आलिंगन ! कितने संतोष से भरा था. नियति ने अज्ञात भाव से मानो लू से तपी हुई वसुधा को क्षितिज के निर्जन से सांयकालीन  शीतल आकाश से मिला दिया हो. जिस वायु विहीन प्रदेश में उखड़ी हुयी साँसों पर बंधन हो , अर्गला हो, वहां रहते रहते यह जीवन असहाय हो गया था. तो भी मरूंगी नहीं. संसार के कुछ दिन विधाता के विधान में अपने लिए सुरक्षित करा लूंगी. कुमार ! तुमने वही किया, जिसे मैं बचाती रही. तुम्हारे उपकार और स्नेह की वर्षा से मैं भीगी जा रही हूँ .ओह!, इस वक्ष स्थल में डॉ ह्रदय हैं क्या ? जब अन्तरंग 'हाँ' करना चाहता है , तब ऊपरी मन न क्यों कहला देता है ?

कुमार ! यह मृत्यु और निर्वासन का सुख, तुम अकेले ही लोगे, ऐसा नहीं हो सकता. मृत्यु के शहर में प्रवेश के समय मैं भी तुम्हारी ज्योति बनकर बुझ जाने की कामना रखती हूँ.

प्रणय ! प्रेम जब सामने से आते हुए तीव्र आलोक की तरह आँखों में प्रकाश पुंज उड़ेल देता है, तब सामने की  सब चीजें और भी अस्पष्ट हो जाती हैं. अपनी ओर से कोई भी प्रकाश किरण नहीं. तब वही केवल वही ! हो पागलपन , भूल हो, दुःख मिले , प्रेम करने की एक ऋतु होती है. उसमें चूकना, उसमें सोच समझ कर चलना दोनों बराबर हैं. सुना है दोनों ही संसार के चतुरों की दृष्टि में मूर्ख बनते हैं.

प्रश्न स्वाम किसी के सामने  नहीं आते. मैं तो समझती हूँ, मनुष्य उन्हें जीवन के लिए उपयोगी समझता है. मकड़ी कि तरह लटकने के लिए अपने आप ही जाला बुनता है. जीवन का प्राथमिक प्रसन्न उल्लास मनुष्य के भविष्य में मंगल और सौभाग्य को आम्नात्रित करता है उससे उदासीन न होना चाहिए.

तुम्हारी स्नेह सूचनाओं की सहज प्रसन्नता और मधुर आलोपों ने जिस दिन मन के नीरस और नीरव शून्य में संगीत की वसंत की  और मकरंद की सृष्टि कि थी . उसी दिन से मैं अनुभूतिमयी बन गयी हूँ. क्या वह मेरा भ्रम था ? कह दो-कह दो वह तेरी भूल थी.

इस भीषण संसार में एक प्रेम करने वाले ह्रदय को खो देना, सबसे बड़ी हानि है. डॉ प्यार करने वाले हृदयों के बीच में स्वर्गीय ज्योति का निवास है.

अभावमयी लघुता में मनुष्य अपने को महत्वपूर्ण दिखाने का अभियान न करे तो क्या अच्छा नहीं है ?

पाषाणी के भीतर भी कितने मधुर स्रोत बहते रहते हैं. उनमें मदिरा नहीं, शीतल जल की धारा बहती है.
प्यासों की तृप्ति -

प्रेम का नाम न लो. वह एक पीड़ा थी जो छूट गयी. उसकी कसक भी धीरे- धीरे दूर हो जाएगी . राजा, मैं तुम्हें प्यार नहीं करती मैं तो दर्प से दीप्त तुम्हारी महत्व्मयी पुरुष - मूर्ती की पुजारिन थी, जिसमें पृथ्वी पर अपने पैरों से खड़े होने कि दृढ़ता थी. इस स्वार्थ मलिन कलुष से भरी मूर्ती से मेरा परिचक्र नहीं.

अपनी तेज कि अग्नि में जो सब कुछ भस्म कर सकता हो, उस दृढ़ता का, आकाश के नक्षत्र कुछ बना बिगड़ नहीं सकते. तुम आशंका मात्र से दुर्बल-कम्पित और भयभीत हो.

'तुम आज कितनी प्रसन्न हो'
-और तुम क्यों नहीं ?
-'मेरे जीवन निशीथ का ध्रुव नक्षत्र इस घोर अन्धकार में अपनी स्थिर उज्ज्वलता से चमक रहा है. आज महोत्सव है न'.
स्त्री और पुरुष का परस्पर विश्वासपूर्वक अधिकार रक्षा और सहयोग ही तो विवाह कहा जाता है. यदि ऐसा न हो तो धर्म और विवाह खेल है.

' रानी, तुम भी स्त्री हो. क्या स्त्री की व्यथा न समझोगी? आज तुम्हारी विजय का अंधकार तुम्हारे शाश्वत स्त्रीत्व को ढक ले, किन्तु सबके जीवन में एक बार प्रेम कि दीपावली जलती है. जली होगी अवश्य. तुम्हारे भी जीवन में आलोक का वह महोत्सव आया होगा, जिसमें ह्रदय, ह्रदय को पहचानने का प्रयत्न करता है. उदार बनता है. और सर्वस्व दान करने का उत्साह रखता हो'

' स्त्रियों के इस बलिदान का भी कोई मूल्य नहीं. कितनी असहाय दशा है. अपने निर्बल और अवलंब खोजने वाले हाथों से यह पुरुषों के चरणों को पकड़ती है. और वह सदैव ही इनको तिरस्कार \, घृणा और दुर्दशा की भिक्षा से उपकृत करता है. तब भी वह बावली मानती है.'

' रोग- जर्जर शरीर पर अलंकारों की सजावट मलिनता और कलुष की ढेर पर बाहरी कुकम्भ - केसर का लेप गौरव नहीं बढाता'.    


कर्म भूमि से ....

ज़िन्दगी कि वह उम्र जब इन्सान को मुहब्बत की सबसे ज्यादा जरूरत होती है बचपन है. उस वक़्त पौधे को तरी मिल जाये, तो ज़िन्दगी भर के लिए उसकी जड़ें मजबूत हो जाती हैं. उस वक़्त खुराक न पाकर ज़िन्दगी खुश्क हो जाती है. मेरी माँ का उसी ज़माने में देहांत हुआ और तब से मेरी रूह को खुराक नहीं मिली. वही भूख मेरी ज़िन्दगी है.

जिन वृक्षों कि जड़ें गहरी होती हैं. उन्हें बार-बार सींचने कि जरूरत नहीं होती. वह जमीन से ही आद्रता लेकर फलते फूलते हैं. सकीना और अमर का प्रेम वही वृक्ष  है. उसे सजग रखने के लिए बार-बार मिलने की जरूरत नहीं.  

मैं प्रेम को संदेह से ऊपर समझती हूँ

 मैं प्रेम को संदेह से ऊपर समझती हूँ वह देह की वस्तु नहीं  आत्मा की वास्तु है. संदेह का वहां जरा भी स्थान नहीं है . और हिंसा तो संदेह का ही परिणाम है. वह सम्पूर्ण आत्मसमर्पण है. उसके मंदिर में तुम परीक्षक बन कर नहीं उपासक बनकर ही वरदान पा सकते हो.

जिसे सच्चा प्रेम कहते हैं, केवल बंधन में बंध जाने के बाद ही पैदा होता है. इसके पहले जो प्रेम होता है वह तो रूप का आसक्ति मात्र है, जिसका कोई टिकाव नहीं, मगर इसके पहले यह निश्चय तो कर लेना ही था कि जो पत्थर साहचर्य के खराद पर चढ़ेगा, उसमें खराडे जाने कि क्षमता है कि नहीं सभी पत्थर तो खराद पर चढ़ कर सुन्दर मूर्तियाँ नहीं बना पाते.

शरीर मात्र से प्रेम करना अपने कोमल और मासूम ह्रदय को बहलाना है. शांत एवं शुभ्र प्रेम- पूर्ण व्यवहार भाग्यशील लोग ही प्राप्त कर पाते हैं.

जो प्रसन्न होकर हँसता है वही दुखी होकर रोता है.

धन ने आजतक किसी नारी के ह्रदय पर विजय नहीं पायी. पायी है और न पा सकेगा.