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Wednesday, June 11, 2014

फकत इतना कहा था हमने उससे तुम बड़े वो हो

मेरा दिल कांच का टुकड़ा नहीं जो टूट जायेगा
समन्दर है कोई दरिया नहीं जो सूख जायेगा

सब कुछ भूलकर तुमको गले से फिर लगा लें हम
किसी का क्या पता कोई कहाँ पे छूट जायेगा

बहुर मायूस होकर दिल सरे बाज़ार रख आये
कोई दिल लूटने वाला लुटेरा लूट जायेगा

फकत इतना कहा था हमने उससे तुम बड़े वो हो
खबर क्या थी कि इतनी बात पे वो रूठ जायेगा

वहीँ पे जख्म  है , देखो दिया था जो तुमने
हमें लगता है, ये नासूर बनकर फूट जायेगा

- 'कशिश'

Tuesday, June 10, 2014

वो चांदनी का बदन खुशबुओं का साया है

वो चांदनी का बदन खुशबुओं का साया है
बहुत अजीज़ हमें है पर पराया है

उतर भी आओ कभी आसमां के सीने से
तुम्हें खुदा ने हमारे लिए बनाया है

उसे किसी की मुहब्बत का एतवार नहीं
उसे ज़माने ने शायद बहुत सताया है

महक रही है जमीं चांदनी के फूलों से
खुदा किसी की मुहब्बत पे मुस्कराया है

- नमालूम
03.09.99


धूप का राही आ बैठा हैजुल्फ के साए में

धूप का राही आ बैठा हैजुल्फ के साए में
जिस्मो जां ने सुकूं पाया है जुल्फ के साए में

तेरी आँखों से पीते हैं लबों के प्याले
ग़ज़ल के शेरों को सोचा है जुल्फ के साए में

धड़कन से धड़कन का रिश्ता जिससे जुड़ता है
दिल ने ऐसे ख़त लिखे हैं जुल्फ के साए में

दिल के अरमानों ने जिन पर चलना सीखा है
वो हर रास्ता रुक जाता है जुल्फ के साए में

- नमालूम

मेरी पलकों पे थोड़ी नमी रह गयी

ये कसक दिल की दिल में चुभी रह गयी
ज़िन्दगी में तुम्हारी कमी रह गयी

एक मैं एक तू एक दीवार थी
ज़िन्दगी आधी-आधी बटी रह गयी

मैंने रोका नहीं वो चला भी गया
बेबसी दूर तक देखती रह गयी

रात की भीगी-भीगी छतों की तरह
मेरी पलकों पे थोड़ी नमी रह गयी

- नमालूम

देख लो आवाज़ देकर पास अपने पाओगे

देख लो आवाज़ देकर पास अपने पाओगे
आओगे तन्हा मगर तन्हा नहीं तुम जाओगे
बेवफाई भी करो तुम तो भी हम कुछ न कहेंगे
हम न वादे से फिरेंगे तुम मगर फिर जाओगे

-नमालूम
26.07.99

Sunday, June 8, 2014

नियते शौक भर न जाये कहीं

नियते शौक भर न जाये कहीं
तू भी दिल से उतर न जाये कहीं

आज देखा है तुमको देर के बाद
आज का दिन गुजर न जाए कहीं

न मिला कर उदास लोगों से
हुस्न तेरा बिखर न जाये कहीं

आरजू है कि तू यहाँ आये
और फिर न जाए उम्र भर कहीं

- नमालूम

जिनमें पानी था वो बादल आग बरसाते रहे

जिनमें पानी था वो बादल आग बरसाते रहे
लोग नावाकिफ हवाओं की सियासत से रहे

कैसा मैला था कि सारा शहर जिसमें खो गया
घर, गली ,बस्ती, मोहल्ले आज तक सूने रहे

उस पराये शख्स से कैसा अजब रिश्ता रहा
आँख नम उसकी हुयी ,हम देर तक भीगे रहे

तेज आंधी के खिलाफ अपनी जगह कायम थे हम
या ये कह लो हतः धर कर हाथ पर बैठे रहे

एक सपना टूटने का दुःख रहा काफी दिनों
अब ये लगता है बहुत लोगों से हम अच्छे रहे

- नमालूम 

कितनी खामोशियां सुनाते हैं

कितनी खामोशियां सुनाते हैं
पेड़ जब बोलने पे आते हैं

वे हमें रास्ता बताते हैं
हम जिन्हें रास्ते पे लाते हैं

क्या है उस पार खुद ही देखेंगे
लोग तो कुछ का कुछ बताते हैं

- नमालूम

ग़म बहुत खुद्दार हैं उनके यहाँ जाते नहीं

ग़म बहुत खुद्दार हैं उनके यहाँ जाते नहीं
जिनके घर में उनकी कोई पूछगछ होती नहीं

मांग लेना रंग सूरज एक दिन अपने सभी
एक तितली रात भर इस खौफ से सोती नहीं

जो उजाले मांगते हैं उनको डस लेती है धूप
छाँह कन्धों पर कभी भी धूप को धोती नहीं

आँख से झरकर गिरी हैं ख्वाब वाली चाहतें
भर गया दामन पर उसमें एक भी मोती नहीं

- नमालूम

Friday, June 6, 2014

जितने लम्हे उधार लाते हैं

जितने लम्हे उधार लाते हैं
सांस ही सांस में चुकाते हैं

तेरी महफ़िल में कुछ  तो है वरना
लोग क्यों बार बार आते हैं

अपनी सूरत से खुद परेशां हैं
आप क्यों आईना दिखाते हैं

तुझको वो खोजते जन्म - जन्मों
जो पता खुद का भूल जाते हैं

बूँद हूँ मैं वजूद मेरा क्या
पर समंदर भी डूब जाते हैं

- नमालूम
24.07.99

किसको यारो माफ़ करूँ , किसको कहूँ सजा बोलूं

किसको यारो माफ़ करूँ , किसको कहूँ सजा बोलूं
सब चेहरे इक जैसे हैं , मुश्किल में हूँ क्या बोलूं

वह भी मुझको छलता है ,वह भी मुझको डसता है
जिसके लिए मैं साड़ी उम्र खुशियों भारी दुआ बोलूं

कुछ तो मजबूरी होगी , यूँ दिल भी तड़पा होगा
तुम वाडे से मुकर गए , कैसे इसे खता बोलूं

साजिश रची सियासत ने , नफरत की बारूद उड़ी
यार भी कातिल बन बैठा , कैसी इसे हवा बोलूं

- नमालूम


ज़िन्दगी की महफ़िल में, ऐसे कौन आता है

ज़िन्दगी की महफ़िल में, ऐसे कौन आता है
कोई शख्स मिलता है, जब ख़ुदा मिलाता है

यूँ तो मैं सुनाता हूँ, जो भी याद आता है
आदमी न जाने क्यूँ, सुन के भूल जाता है

तुम मेरे करीब आओ , दिल की रौशनी बनकर
चाँद का भरोसा क्या , चाँद डूब जाता है

कितना रब्त है दिल को , झनझनाते तारों से
साज को जो छूता हूँ, जिस्म गुनगुनाता है

तकते- तकते राहों को, थक गयीं मेरी आँखें
जाने कब वह आएगा, दिल जिसे बुलाता है

देख, मारने वाले, तेरे दस्त-ओ-बाजू से
उसके हाथ लम्बे हैं , जो मुझे बचाता है

मेरे दिल की दुनिया में, इक चिराग है 'संजर'
जो मुझे अंधेरों में , रास्ता दिखाता है

- 'संजर'

राह-ए- हस्ती में साथ छोड़ गया

राह-ए- हस्ती में साथ छोड़ गया
ग़म से रिश्ता हमारा जोड़ गया

क्यों न दिल उसका होके रह जाए
टूटे रिश्ते को कोई जोड़ गया

उसको अहसास भी नहीं इसका
दिल का आईना भी वो तोड़ गया

फख्र था जिसकी हमराही पे  मुझे
दो कदम चलके , साथ छोड़ गया

उसका अहसानमंद हूँ 'अंदाज'
अपनी यादों से मुझको जोड़ गया

- 'अंदाज'
24.0799

Thursday, June 5, 2014

आजकल याद नहीं कुछ भी रहता मुझको

आजकल याद नहीं कुछ भी रहता मुझको
एक बस तेरा ही ख्याल है मुझको

दूर अब तुझसे रहेंगे तो मर ही जायेंगे
हर घड़ी तेरे ही आने का है एतवार मुझको

आ तेरे सोने को सपने बुने मैंने
और मांगी है दुआएं कि वो मिले मुझको

ख़ुदा करे कि वो इतने करीब आ जाएँ
कि डर न तुझसे बिछड़ने का फिर रहे मुझको

- नमालूम

जिन्हें हम भूलना चाहें

जिन्हें हम भूलना चाहें  वो अक्सर याद आते हैं
बुरा हो इस मुहब्बत का वो क्यों कर याद आते हैं

भुलाएँ किस तरह उनको कभी पी थी उन आँखों से
छलक जाते हैं जब आंसू वो सागर याद आते हैं

किसी के सुर्ख लब थे या दिये की लौ मचलती थी
जहाँ की थी कभी पूजा वो मंदिर याद आते हैं

रहे ऐ शम्मा तू रोशन दुआ देता है है परवाना
जिन्हें किस्मत में जलना है वो जलकर याद आते हैं

- नमालूम

आईना सामने आया तो बुरा मान गए

बेवफा कहके पुकारा तो बुरा मान गए
आईना सामने आया तो बुरा मान गए

तीर पर तीर चलाते थे कोई बात न थी
मैंने एक तीर चलाया तो बुरा मान गए

उनकी हर रात गुजरती थी दीवानों की तरह
मैंने एक रात गुजारी तो बुरा मान गए

- नमालूम

रातों को गर न अश्क़ बहाऊं तो क्या करूं

रातों को गर न अश्क़ बहाऊं तो क्या करूं
एक पल भी उसको भूल न पाऊं तो क्या करूं

तुम ही तो होगे कि छोड़ दे जब ज़िन्दगी भी साथ
फिर भी मौत को गले न लगाऊं तो क्या करूं

सोचा तो था कि छोड़ दूँ  उसकी गली वो मुराद
लेकिन कहीं करार न पाऊं तो क्या करूं

इतना प्यार करते हो कि दिल तो हो गया तुम्हारा
राहों में न दिल को बिछाऊं तो क्या करूं

- नमालूम

प्यार पाने में वक़्त लगता है

प्यार पाने में वक़्त लगता है
दिल चुराने में वक़्त लगता है

लाख उड़ने की तमन्ना हो मगर
पर उगाने में वक़्त लगता है

इन परिंदों को गौर से देखो
घर सजाने में वक़्त लगता है

याद के वास्ते हैं तस्वीरें
भूल जाने में वक़्त लगता है

पत्थरों को भी पूजते रहिये
बुत बनाने में वक़्त लगता है

मुस्कराते रहो सदा 'पीयूष'
रोने-गाने में वक़्त लगता है

- 'पीयूष'

सहज अभिव्यक्ति

सहज अभिव्यक्ति को ऐसी मिली अद्भुत रवानी है
नयों में यह नयी पुरानों में पुरानी है

लगी है बोलने खुलकर नहीं तुत्लाहटें बाकी
हमारी साधना सचमुच हुयी कितनी सयानी है

मिटाते जा रहे फिर भी सभी पग चिन्ह राहों से
समय आकर स्वयं खोजे कहाँ किसकी निशानी है

कि जिसने युग बदल डाले रंगे इतिहास के पन्ने
रहेगी जो अमर जग में शहीदों की जवानी है

कंटीली प्यास आखिर क्या बिगाड़ेगी हमारा कुछ
कहीं कुछ भी न हो बाकी अभी आँखों में पानी है

नहीं है यह ग़ज़ल कोई न कोई गीत या कविता
'मधुर' के दर्द का स्वर है नहीं कोई कहानी है

- 'मधुर'

Tuesday, June 3, 2014

चुपके-चुपके रात दिन

चुपके-चुपके रात दिन  आंसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

बाहज़ारां इज़्तराब वसद हजारां इश्त्याक
तुझ से वो पहले पहल दिल का लगाना याद है

तुझ से कुछ  मिलते ही वो बेबाक हो जाना मेरा
और तेरा दांतों में वो अंगुली दबाना याद है

खींच लेना वो मेरा परदे का कोना दफातन
और दुपट्टे से तेरा वो मुंह छिपाना याद है

तुझ को जब तन्हा कहीं पाना तो अज़राह लिहाज
हाले दिल बातों ही बातों में जताना याद है

गैर की नज़रों से बचकर सब की मर्जी के खिलाफ
वो तेरा चोरी छिपे रातों को आना याद है

दोपहर को धूप में मेरे बुलाने के लिए
वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है

चोरी-चोरी हमसे तुम आकर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुजरीं पर अब तलक वो ठिकाना याद है

- नमालूम
10.06.99